इलाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
इलाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 21 जून 2011

नजर न लग जाए

आई स्ट्रेन यानी आंखों का तनाव एक आम समस्या है। कंप्यूटर या लैपटॉप पर लगातार काम करने और ज्यादा टीवी देखने के अलावा ऐसे कई और काम हैं, जिनके कारण यह समस्या आ सकती है। आई स्ट्रेन ज्यादा गंभीर हो जाए तो इसकी वजह से कई दूसरी समस्याएं भी हमला कर देती हैं। आंखों के इस तनाव से बचने के तरीके एक्सपर्ट्स से बात करके बता रहे हैं प्रभात गौड़ :




स्ट्रेन क्या होता है



आई स्ट्रेन दरअसल आंखों को कंट्रोल करने वाली मसल्स का स्ट्रेन होता है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि अगर आंख को एक ही स्थिति में लंबे वक्त तक रखा जाए तो आंख की मांसपेशियों में तनाव आ जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि किसी एक ही चीज पर लंबे वक्त तक आंखों को फोकस किया जाए या किसी एक ही दूरी पर मौजूद चीज पर आंखों को देर तक स्थिर रखा जाए तो भी आंख में तनाव आ जाता है। नजदीक की चीजों पर फोकस करने से आंख में स्ट्रेन आने की संभावना ज्यादा होती है। दूर की चीजों पर फोकस किया जाए तो स्ट्रेन उतनी जल्दी नहीं होता। जल्दी-जल्दी दूरी बदलने पर भी आंखों में स्ट्रेन बढ़ जाता है।



इनसे हो सकता है स्ट्रेन



जिन ऐक्टिविटीज में लंबे समय तक एक ही चीज पर आंखों को फोकस करना होता है, उनमें स्ट्रेन हो सकता है। ये गतिविधियां हैं :



- कंप्यूटर का इस्तेमाल

- टीवी या मोबाइल की स्क्रीन लगातार देखना

- पढ़ना

- ड्राइविंग



इसके अलावा इन वजहों से भी आंखों में स्ट्रेन हो सकता है।



- कम रोशनी

- किसी चीज को देखने का गलत एंगल

- ज्यादा चमकदार चीजों को देखना

- स्क्रीन के कंट्रास्ट लेवल का कम होना

- सही नंबर का चश्मा न पहनना या निगाह कमजोर होने पर भी कम नंबर का चश्मा लगाना

- स्ट्रेस, थकान

- बैठने का गलत तरीका

- अल्कोहल या ड्रग्स का इस्तेमाल



क्या हैं लक्षण



- आंखों में दर्द या चिड़चिड़ापन

- सिर में दर्द या माइग्रेन

- नजर कमजोर होते जाना और चश्मे के नंबर में बार-बार बदलाव

- पास से दूर नजर फोकस करने में दिक्कत होना

- कभी-कभी एक की दो चीजें नजर आना

- आंखों में सूखापन



रिस्क



आंखों में तनाव का कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है, लेकिन इसकी वजह से आपको जल्दी थकान हो सकती है और यह आपकी ध्यान से काम करने की क्षमता को भी कम कर सकती है। अगर आई स्ट्रेन दूर करने के तरीके अपना लिए जाएं तो भी कई बार आंखों के तनाव को दूर होने में कई दिनों का वक्त लग सकता है।



बचाव के तरीके



1. ऑफिस में खेलें 20-20



- अगर कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं या टीवी देख रहे हैं तो काम के साथ-साथ 20-20 भी खेलते रहें।



- इसके लिए 20 मिनट तक लगातार स्क्रीन पर फोकस करने के बाद 20 सेकंड के लिए नजर वहां से हटाएं और अपने से 20 फुट की दूरी पर स्थित किसी चीज पर फोकस करें। इसके अलावा टी20 की तरह स्ट्रैटजिक टाइम आउट भी लेते रहें यानी काम के दौरान हर घंटे आंखों को पांच मिनट के लिए आराम दें। हर दो घंटे के बाद सीट से उठ जाएं और कुछ चलने-फिरने का काम निबटा लें। मसलन फोन पर ऑर्डर देने की बजाय चाय लेने खुद कैंटीन चले जाएं, पानी की बोतल खुद भर लाएं आदि। ऐसा करने से आंखों को आराम मिलेगा। टीवी देख रहे हैं तो भी बीच-बीच में इसी तरह छोटे-छोटे ब्रेक लेते रहें।



- अगर आंखें पास की चीजों पर फोकस करती हैं तो उन्हें ज्यादा काम करना पड़ता है। ऐसे में बीच बीच में दूर की चीजों पर नजर फोकस करना जरूरी है।



- ड्राइविंग करते वक्त भी नजर लगातार सामने रहती है। ऐसे में बीच-बीच में नजर स्पीडोमीटर पर डालते रहना चाहिए।



2. ज्यादा चमक नहीं अच्छी



- नॉन-रिफ्लेक्टिव इंटरफेस का इस्तेमाल ज्यादा-से-ज्यादा करें। नॉन-रिफ्लेक्टिव इंटरफेस का मतलब है ऐसी सतह, जिससे कम-से-कम चमक आंखों पर पड़ती हो।



- अगर कुछ आप पेपर या मैगजीन से पढ़ सकते हैं तो उसे ऑनलाइन पढ़ने की कोशिश न करें। पेपर पर पढ़ने से स्क्रीन पर पढ़ने के मुकाबले आंखों की मसल्स को कम मेहनत करनी पड़ती है और उन पर चमक नहीं पड़ती।



- मोबाइल पर हालांकि ज्यादा देर नजर टिकाने की कम जरूरत पड़ती है, लेकिन आजकल तमाम फीचर्स से लैस मोबाइल फोंस आ रहे हैं, जिनमें अकसर लोग लंबे समय तक नजरें जमाए रहते हैं। ऐसे में मोबाइल की स्क्रीन के रिफ्लेक्शन को कम करके रखें, जिससे आंखों पर कम चमक पड़े।



3. कंप्यूटर हो ऐसा



- कंप्यूटर फ्लैट स्क्रीन वाले हों तो बेहतर है। उनसे आंखों को कम नुकसान पहुंचता है।



- कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि हो सके तो कंप्यूटर स्क्रीन पर ऐंटि- ग्लेयर फिल्टर का इस्तेमाल करें। इसी तरह ऐंटि- ग्लेयर चश्मे का यूज भी किया जा सकता है, लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि आजकल कंप्यूटर स्क्रीन में ही ब्राइटनेस और कंट्रास्ट को ऐडजस्ट करने की सुविधा होती है। इसे अपनी आंखों और आसपास की रोशनी के हिसाब से ऐडजस्ट कर लें, तो आंखों के तनाव को खुद ही कम किया जा सकता है।



- कंप्यूटर की स्क्रीन उस तरफ करके न रखें, जहां से रोशनी का रिफ्लेक्शन स्क्रीन पर पड़ता हो।



- मॉनिटर के ऊपर जमी धूल को रोजाना साफ करें।



- कंप्यूटर पर काम करते वक्त रोशनी की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए।



- कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन आपकी आंखों से भरपूर दूरी पर होनी चाहिए। यह दूरी 20 इंच के करीब रख सकते हैं।



- फ्लिकर को कम करने के लिए स्क्रीन की रिफ्रेश रेट को 70 हर्ट्ज के आसपास रखना चाहिए। इसे सेट करने के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर राइट क्लिक करें। properties में जाएं। फिर यह रूट फॉलो करें settings-advance-monitor यहां स्क्रीन रिफ्रेश रेट को सेट कर सकते हैं।



4. एलसीडी बेहतर



- जिस जगह टीवी देख रहे हैं, वहां रोशनी की भरपूर व्यवस्था होनी चाहिए।



- टीवी देखते वक्त सुनिश्चित करें कि रोशनी का स्त्रोत आपकी साइड नहीं, टीवी की साइड में हो। मतलब जब आप टीवी देखें तो प्रकाश भी उसी दिशा से आए जिस दिशा से टीवी की चमक आ रही है।



- सामान्य टीवी में फ्लिकरिंग रेट बहुत ज्यादा होता है। ऐसे में टीवी देखने के लिए आंखों की पुतली को बार-बार छोटा-बड़ा करना पड़ता है और आंखों की मांसपेशियां जल्दी थकती हैं। ऐसे में एलसीडी का ऑप्शन बेहतर है। इसमें फ्लिकर रेट कम होता है और आंखों को आराम रहता है।



- लेटकर टीवी कभी न देखें। इससे आंखों का एंगल अलग-अलग हो जाता है, जिसकी वजह से दिक्कत हो सकती है।



5. नजर पर रहे नजर



- स्क्रीन पर लगातार काम करने वाले लोगों को अपनी नजर रेग्युलर चेक कराते रहना चाहिए।



- जिन लोगों को बेहद कम नंबर की जरूरत है, उनकी आंखों की मसल्स उस नजर की कमी की भरपाई करती हैं, जिससे उन्हें ज्यादा काम करना पड़ता है और थकान होती है। इसलिए चश्मे का अगर कम-से-कम नंबर भी है तो उसे जरूर लगाएं। 0.25 नंबर है, तो भी उसे जरूर लगाना चाहिए।



- अगर पहले से चश्मे का इस्तेमाल करते हैं तो भी यह चेक कराते रहें कि चश्मे का नंबर बढ़ तो नहीं गया है। गलत नंबर का चश्मा लगाना सिर और आंखों में दर्द होने की वजह हो सकता है।



- साल में एक बार आंखों का जनरल चेकअप जरूर करा लें।



6. एक्सरसाइज काम की



कंप्यूटर / टीवी देखने से आज के वक्त में हम पूरी तरह बच तो नहीं सकते, लेकिन उससे होने वाले नुकसान को कम जरूर कर सकते हैं। ये टिप्स और एक्सरसाइज आपके काम की हो सकती हैं।



- दोनों हथेलियों को आपस में तकरीबन 30 सेकंड तक रगड़ें। हथेलियां हल्की गर्म हो जाएंगी। इनसे दोनों आंखों को बंद कर लें। आंखें इस तरह बंद करनी है, जिससे रोशनी आंखों तक न पहुंचे। इस स्थिति में दो मिनट रहें। इससे थकी आंखों को काफी आराम मिलता है। इस प्रक्रिया को दिन में दो-तीन बार कर सकते हैं।



- हाथ के अंगूठे को आंखों से करीब 15 सेमी दूर रखें और अंगूठे के टिप पर फोकस करें। गहरी लंबी सांस लें और जाने दें। इसके बाद करीब चार मीटर की दूरी पर रखी किसी चीज पर आंखों को फोकस करें। फिर लंबी-गहरी सांस लें और छोड़ दें। इस प्रॉसेस को तीन-चार बार दोहरा सकते हैं। दिन में दो-तीन बार ऐसा कर सकते हैं।



- पानी की दो कटोरियां ले लें। एक में गर्म पानी लें और दूसरी में बर्फीला ठंडा। दोनों कटोरियों में एक एक कपड़ा डालकर रखें। आंखों को बंद कर लें। पहले गर्म पानी में भिगोया हुआ कपड़ा आंखों पर आधे मिनट के लिए रखें। इसके बाद ठंडे पानी में भिगोया कपड़ा आंखों पर रखें। एक के बाद एक ऐसा करते जाएं। दो से तीन मिनट ऐसा कर लें। इसके बाद उंगलियों से आंखों की हल्की मसाज कर लें।



- आंखों को क्लॉकवाइज और ऐंटि-क्लॉजवाइज दिशा में घुमाएं। क्लॉकवाइज एक बड़ा जीरो बनाएं। ऐसा ही एक जीरो ऐंटि-क्लॉकवाइज बनाएं। 10-10 बार दोनों तरफ से कर लें। दिन में दो से तीन बार तक कर सकते हैं।



- काम के बीच-बीच में आंखें बंदकर बैठें। 10 सेकंड के लिए ऐसा करें और फिर काम करें। दरअसल, खुली आंखें ऊर्जा को बाहर फेंक रही होती हैं, जबकि बंद आंखें ऊर्जा को हासिल करती हैं। आंखें बंद करने से न सिर्फ आंखों को, बल्कि मन को भी सुकून मिलता है।



- मुंह में ठंडा पानी भरें और आंखों पर पानी के छपाके मारें। ध्यान रहे, छपाके सीधे आंख पर जाकर न लगें। इससे चोट लगने का खतरा रहता है। ऐसा दिन में तीन से चार बार कर लें। जब भी आंखें भारी महसूस हों, काम से ब्रेक लें और यह क्रिया कर लें।



- गुलाबजल से रुई को भिगो लें और उसे पांच मिनट तक आंखों पर रखें। इससे ठंडक मिलेगी और तनाव कम होगा।



- रोज सुबह हरी घास पर (ओस वाली) पर नंगे पैर आधा घंटा टहलें। आंखों की सारी गर्मी निकल जाएगी।



- आंखों की भवों को पकड़कर दबाते हुए आंख के चारों तरफ हल्की मालिश करें। इससे आंख के अंदर खून के बहाव में बढ़ोतरी होगी और आंखों का तनाव चला जाएगा।



- सीधे किसी भी आसन में बैठ जाएं। सीधा हाथ सामने रखें। अंगूठा आंखों के सामने रहे। इसे देखते रहें। अब अंगूठे को सीधे हाथ की तरफ ले जाएं। नजर अंगूठे के साथ-साथ चलती जाएगी। अंगूठा वापस बीच में ले आएं। इस क्रिया के दौरान गर्दन नहीं घूमनी चाहिए। अब यही क्रिया लेफ्ट हैंड से दोहराएं। तीन-चार राउंड कर लेने चाहिए। इस दौरान नजर अपलक रहे तो अच्छा है।



- सीधा हाथ सामने रखें। अंगूठा आंखों की तरफ लाएं। जितना देख सकें, देखें। इसमें भी नजर अपलक ही रहेगी।



- आंखों को जल्दी-जल्दी खोलें और बंद करें। ऐसा 15 से 20 बार कर सकते हैं।



- कपालभाति, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम आंखों के लिए बेहद अच्छे माने जाते हैं।



- इसके अलावा जलनेति और सूत्रनेति भी फायदेमंद हैं। इन क्रियाओं को किसी योग्य गुरु से सीखकर ही करना चाहिए।



- हरी सब्जियों का सेवन करें। नींद पूरी लें।



8. सामान्य दवाएं



ऐलोपैथी



- कुछ सामान्य दवाएं हैं, जिन्हें आंखों की थकान दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसी दवाओं में रिफ्रेश टियर्स (Refresh Tears ) , जेंटील (Genteal ) और टियर प्लस (Tear Plus ) के नाम लिए जा सकते हैं। इन दवाओं की एक-एक बूंद को रात के वक्त आंखों में डाल सकते हैं या जब भी आंखों में थकान महसूस तो भी इसे यूज कर सकते हैं।



होम्योपैथी



होम्योपैथी में आई स्ट्रेन के लिए कुछ खास दवाएं दी जाती हैं। नीचे दी दवाओं को 30 नंबर की गोली और 30 नंबर की पावर के साथ ले सकते हैं।



- अगर आंखों में ड्राईनेस है और कंप्यूटर पर ज्यादा देर तक देखने से आंखों में तनाव होता है तो फाइसोस्टिग्मा ( (Physostigma ) या रूटा (Ruta ) दवाएं दी जाती हैं।



- अगर आंखों में लाल होने, सूजने या पानी आने की समस्या है तो बेलाडोना (Belladonna) दी जाती है।



- अगर उम्र 40 से ऊपर है और आंखों में तनाव महसूस होता है तो अर्जेंटम नाइट्रिकम (Natrum Mur ) ली जा सकती है।



- आंखों में स्ट्रेन के साथ अगर सिर दर्द और उल्टी जैसी भी महसूस होती है तो नैट्रम म्यूर (Natrum Mur ) दी जा सकती है। ऐसे लोगों को नमक खाने की ज्यादा इच्छा होती है।



- इसके अलावा कुछ आंखों में डालने की दवाएं भी हैं। इन दवाओं को दिन में तीन बार एक-एक बूंद डाल सकता है। ये दवाएं हैं: यूफ्रेशिया (Euphrasia ) और सिनेरेरिया (Cinneraria ) की)। पहली दवा को किसी भी उम्र का शख्स डाल सकता है और दूसरी दवा 40 से ऊपर के लोगों को डालनी चाहिए।



गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

बचें खांसी की फांसी से


खांसी यूं तो अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, पर यह शरीर के अंदर पनप रही या पनपने की कोशिश कर रही दूसरी बीमारियों का लक्षण जरूर है। वैसे, आम इलाजों से खांसी ठीक भी हो जाती है, पर कई बार यह किसी गंभीर बीमारी की ओर भी इशारा कर सकती है, इसलिए इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। एक्सपर्ट्स से बात करके खांसी के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं नरेश तनेजा :

क्या होती है खांसी
खांसी फेफड़ों, सांस की नलियों और गले में इन्फेक्शन या किसी कमी की वजह से होती है। नाक या मुंह की बीमारियों से खांसी नहीं होती। खांसी फेफड़ों या श्वसन तंत्र की किसी दूसरी बीमारी का लक्षण है, यानी खांसी इशारा है इस बात का कि शरीर के अंदर कोई बीमारी है। इसे शरीर का एक तरह का सुरक्षा मिकेनिज्म या उपाय भी कह सकते हैं। खांसी करके हमारा सिस्टम शरीर को बीमारियों के जीवाणुओं और कीटाणुओं से मुक्ति दिलाने की कोशिश करता है। इसमें हमें थोड़ी तकलीफ तो जरूर होती है क्योंकि मांसपेशियों व शरीर के बाकी अंगों पर जोर पड़ता है, लेकिन असल में उस समय शरीर अंदर ही अंदर अपनी रक्षा करने की कोशिश कर रहा होता है। हालांकि कई बार खांसी दूसरों तक बीमारी के कीटाणु या जीवाणु फैलाने का कारण भी बन जाती है।

कितनी तरह की होती है
सामान्य खांसी, ठस्के वाली खांसी (जिसका दौरा पड़ता है), कुकुर खांसी, काली खांसी और दमे से होने वाली खांसी। काली खांसी ऐसी खांसी को कहते हैं, जो लगातार आए, जिसमें सांस लेने का भी मौका न मिले और काफी देर बाद सांस आता हो। खांसी का ठस्का-सा लगता है। अमूमन यह बच्चों और किशोरों को होती है।

क्यों होती है खांसी
दमे से, गले में इन्फेक्शन से, टॉन्सिल्स से, फेरॅनजाइटिस से, ब्रोंकाइटिस से, फेफड़ों के इन्फेक्शन या दूसरी बीमारियों से, न्यूमोनिया से, दिल की बीमारियों की वजह से, बच्चों में पेट के कीड़ों के फेफड़ों में पहुंचने पर और एसिडिटी आदि से खांसी होती है।

हो सकती है यह दिक्कत
खांसी में बेचैनी, आंखों में खून या लाली आ जाना, सिरदर्द, कभी-कभी फेफड़ों में सूजन होना, मांसपेशियों पर जोर पड़ने से छाती में दर्द आदि हो सकता है।

क्या संकेत करती है
आपके श्वसन तंत्र या गले या फेफड़ों में कोई तकलीफ है, उसे नजरअंदाज न करें। लगातार तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी रहे तो टीबी का संकेत हो सकती है, जिसकी पूरी जांच होनी चाहिए।

ये बातें याद रखें
कई बार एसिडिटी की वजह से भी खांसी होती है क्योंकि पेट में बना एसिड ऊपर चढ़कर सांस की नली में चला जाता है। ऐसे में एसिडिटी का इलाज जरूरी है, न कि खांसी का।
कई बार दिल का बायां हिस्सा बढ़ जाए या फेफड़ों की नसों का प्रेशर ज्यादा हो तो भी खांसी होने लगती है। इसे दिल का अस्थमा भी कहते हैं।
खांसी दमा का लक्षण भी हो सकती है। हालांकि दमा होने पर खांसी के वक्त सीटी बजना जरूरी नहीं है।
सिर्फ खांसी होना स्वाइन फ्लू का लक्षण भी हो सकता है।
तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर टीबी की जांच करवा लेनी चाहिए। ऐसे में बलगम की तीन बार जांच करानी चाहिए।
दूसरों से दूर होकर खांसें। मुंह पर नैपकिन रख लें और खांसने के बाद उसे डस्टबिन में फेंक दें।
खाना खाते वक्त खांसी आए तो ध्यान से धीरे-धीरे खाएं, वरना खाने के टुकड़े सांस की नली में जा सकते हैं।
कुछ खाना फंस जाने से खांसी आने लगे तो पीड़ित की पीठ सहला दें। गुनगुना पानी पिला दें। आराम न मिले तो डॉक्टर को दिखाएं।
लेटते वक्त कोई भी खांसी बढ़ जाती है क्योंकि लेटने पर दिल पर प्रेशर बढ़ जाता है।

क्या ये सेफ हैं
खांसी की गोलियां मसलन विक्स, हॉल्स, स्ट्रेप्सिल्स आदि सेफ हैं। इनका कोई नुकसान नहीं है। इनसे आराम भी महसूस होता है। कफ सिरप भी लिए जा सकते हैं, पर कफ सिरप से शरीर और दिमाग में जरा सुस्ती आ जाती है।

एलोपैथी

एलोपैथी के अनुसार खांसी अलग-अलग तरह की होती है - नाक की खांसी, गले की खांसी, फेफड़े या दिल की खांसी। नाक की खांसी को नैसल एलर्जी या नैसल अस्थमा भी कहते हैं। इसमें खांसी के साथ छींकें व नाक से पानी बहता है।

दवा : सिट्रिजिन-10 एमजी ( Cetrizine ) या एलेग्रा-120 एमजी ( Allegra ) की एक गोली रोज।

गले की खांसी
गले की खांसी सूखी व बलगम वाली, दोनों हो सकती है। एक में गले में सिर्फ खराश होगी और खांसी नहीं आएगी। दूसरे में खराश के साथ खांसी आएगी।

खराश के साथ खांसी आए तो विटामिन-सी की गोली के साथ सिटजिन-10 एमजी या एलेग्रा-120 एमजी या तीन बार विकोरिल (Wikoryl) की गोली दी जा सकती है। अगर सिर्फ खराश हो तो पेंसिलिन ग्रुप की दवाएं दी जा सकती हैं।

फेफड़े या दिल की खांसी
खांसी में अगर बलगम के साथ सीटी भी बज रही है तो फेफड़ों की खांसी कही जाएगी। इसके लिए ब्रोंकोडिल या ब्रोंकोरेक्स सिरप के अलावा इनहेलर भी दिया जा सकता है।

अगर बिना बलगम और बिना सीटी के सूखी खांसी है तो यह हार्ट का अस्थमा हो सकता है। इसमें फौरन जांच करानी चाहिए। जांच के बाद ही दवाएं दी जा सकती हैं।

इसके अलावा, साइनस या एसिडिटी से होने वाली खांसी भी होती है। इनमें भी जांच के बाद लक्षणों के अनुसार दवा दी जाती है।

सिरप या चूसने की गोलियां

सिरप
शुगर के मरीज हिमालय ड्रग्स कंपनी का डायकफ सिरप या प्रोस्पैन सिरप ले सकते हैं। ये दोनों शुगर फ्री हैं। आम लोग भी इन्हें ले सकते हैं।

मुल्तानी फामेर्सी वालों का कूका सिरप, कासामृत सिरप, अमृत रस सिरप, सोममधु सिरप या हिमालय ड्रग्स का सेप्टिलीन सिरप या महर्षि फार्मा का कासनी सिरप लें। इसके अलावा, एलोपैथी में एलेक्स, कफरिल, ब्रोंकोरेक्स व ब्रोंकोडिल सिरप हैं।

चूसने की गोलियां
लवंगादि वटी, कासमर्दन वटी, कंठसुधारक वटी, कर्पूरादि वटी या खादिरादि वटी की एक या दो गोली दिन में चार बार चूसें।

लौंग, मुलहठी, स्वालीन, हॉल्स, विक्स, हनीटस या अदरक कैंडी चूसें।

होम्योपैथी में सिरप
रेकवैग का जस्टसिन (Justussine), एसबीएल का स्टोडल (Stodal) और बैक ऐंड कॉल कंपनी का कॉफीज (Cofeez) सीरप। इन्हें शुगर के मरीज भी ले सकते हैं क्योंकि ये मीठे में नहीं बनाये जाते।

खांसी में परहेज

ये चीजें न खाएं
मूंगफली के ऊपर से पानी, चटपटी व खट्टी चीजें, ठंडा पानी, दही, सॉस, सिरका, अचार, अरबी, भिंडी, राजमा, उड़द की दाल, लेसदार चीजें, खट्टे फल, केला, कोल्ड ड्रिंक, इमली, तली-भुनी चीजों को खाने के बाद पानी न पीएं। एकदम गर्म खाकर भी ठंडा पानी न पीएं। फ्रिज में रखी चीजें व चॉकलेट न खाएं। ठंडा दूध न लें।

इनको आजमाएं
दूध में सौंठ डालकर पीएं।
सौंठ डालकर गरम पानी पीएं।
गुनगुना पानी पीएं।
मुलहठी चूसें।
शहद, किशमिश, मुनक्का लें।
शुगर वाले एक-दो अंजीर पीसकर या रात को भिगो कर लें।
धुएं व धूल से बचाव रखें।

होम्योपैथी

सूखी खांसी : ब्रायोनिया-30 (Bryonia) या स्पॉन्जिया-30 (Spongia)
बलगमी, घरघराहट वाली खांसी : एन्टिम टार्ट-30 (Antim Tart) या आईपीकॉक-30 (Ipecac)
जुकाम बुखार के साथ खांसी : बेलाडोना-30 (Belladonna) या एकोनाइट-30 (Aconite) या हेपरसल्फर-30 (Hepar Sulphur)
काली खांसी : ड्रोसेरा-30 Drosera) या कूप्रम मैट-30 (Cuprum Mat)

बच्चों की खांसी : सूखी और शुरुआती खांसी है तो बेलाडोना-30 बेलाडोना-30 (Belladonna), बलगमी हो तो सेम्बूकस-30 (Sambucus) या फॉसफोरस-30 (Phosphorus)। चार से छह गोली दिन में तीन बार सात दिन तक दें।

रात को दिक्कत हो तो : ट्रायो ऑफ कफ मेडिसिन के नाम से तीन दवाएं आती हैं। जिन लोगों को खांसी की दिक्कत अक्सर होती हो, उन्हें इन्हें घर में रखना चाहिए। ये हैं : बेलाडोना-30 (Belladonna) व हेपर सल्फर-30 (Hepar Sulphur) व स्पॉन्जिया-30 (Spongia)। रात को इमरजेंसी में इनमें से किसी एक की चार-छह गोलियां एक-एक घंटे बाद थोडे़ गर्म पानी से ले सकते हैं। स्पॉन्जिया-30 (Spongia) दिल के मरीजों के लिए खांसी की स्पेशल दवा है।

नोट : ऊपर लिखी सभी दवाएं शुगर, ब्लड प्रेशर और दिल के मरीज भी ले सकते हैं। सभी की डोज एक जैसी होगी। दिन में चार बार पांच-पांच गोलियां लें।

आयुर्वेद
आयुर्वेद के अनुसार, जब कफ सूखकर फेफड़ों और श्वसन अंगों पर जम जाता है तो खांसी होती है। इसके लिए नीचे लिखे तरीकों में से कोई एक करें। इन दवाओं और नुस्खों को बीपी या दिल के मरीज भी अपना सकते हैं, पर डायबीटीज के मरीज सितोपलादि चूर्ण और कंठकारी अवलेह न लें क्योंकि उनमें मीठा होता है।

सूखी खांसी

हिमालय की सेप्टिलिन एक गोली सुबह-शाम सात दिन तक लें।
अमृर्ताण्व रस दो गोली सुबह व दो गोली शाम को पानी से लें।
सितोपलादि चूर्ण शहद में मिलाकर एक चम्मच चाटें। बच्चों को भी दे सकते हैं।
तालिसादि चूर्ण (करीब आधा चम्मच) पानी से दिन में तीन बार लें। बच्चों को भी दे सकते हैं।
जे एंड जे डिशेन कंपनी की डेंजाइन या डेस्मा की एक-एक गोली तीन बार पानी से लें या बिना पानी के चूसें। शुगर के मरीज और बच्चे भी ले सकते हैं।
चंदामृत रस की दो-दो गोली सुबह-शाम पानी से लें। शुगर के मरीज और बच्चे भी ले सकते हैं।
ज्यादा खांसी हो तो सेंधा नमक की छोटी-सी डली को आग पर रखकर गर्म करें और एक कटोरी पानी में डाल कर बुझा लें। उसी डली को फिर गर्म करें और पानी में डाल लें। ऐसा पांच बार करके यह पानी पिला दें। दिन में दो बार करें। बच्चों के लिए मुफीद है।
थोड़ी-सी फिटकरी को तवे पर भूनें। आधी मात्रा में अभ्रक भस्म मिलाकर चाटें।
हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर चाटें।
त्रिफला और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी फायदा होता है।
12 ग्राम हल्दी, 24 ग्राम गुड़ और तीन ग्राम पकाई हुई फिटकरी का चूर्ण मिलाकर गोलियां बना लें और दो-दो गोलियां दिन में दो-तीन बार चूसें।
तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय पीएं।
दिन में दो बार गुनगुने दूध के गरारे करें।
दिन में दो-तीन बार शहद चाटें।
रात को गर्म चाय या दूध के साथ आधी चम्मच हल्दी की फंकी लें।
खराश में कंठकारी अवलेह आधा-आधा चम्मच दो बार पानी से या ऐसे ही लें।

बलगमी खांसी
हमदर्द का जोशीना गर्म पानी में डालकर लें।
महालक्ष्मी विलास रस की एक गोली दो बार पानी से लें।
कफांतक रस की एक गोली दिन में तीन बार कत्था-चूना लगे हुए पान के साथ लें।
काली मिर्च के चार दाने घी में भूनकर सुबह-दोपहर और शाम को लें।
काली मिर्च के चार दाने, एक चम्मच खसखस के दाने और चार दाने लौंग को गुड़ में मिलाकर गर्म करके तीन हिस्से कर लें। दिन में एक-एक कर तीन बार लें।
पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर रख लें। चौथाई चम्मच शहद के साथ दिन में दो बार चाट लें।
चौथाई कटोरी पानी में पान का पत्ता और थोड़ी-सी अजवायन को डालकर उबाल लें। आधा रहने पर पत्ता फेंक दें। पानी में चुटकी भर काला नमक व शहद मिलाकर रख लें। इसी में से दिन में दो-तीन बार पिलाएं। बच्चों के लिए बेहद फायदेमंद है।
विक्स, नीलगिरी का तेल, यूकेलिप्टस का तेल, मेंथॉल ऑयल में से कोई भी गर्म पानी में डालकर दिन में दो-तीन बार स्टीम लें। सादे गर्म पानी की भाप भी ले सकते हैं।

जुकाम-बुखार के साथ खांसी
महालक्ष्मी विलास रस या त्रिभुवन कीर्ति रस की एक-एक गोली दो बार लें।
संजीवनी वटी एक गोली दिन में दो बार लें।
नागवल्लभ रस की एक गोली दिन में तीन बार पान के पत्ते में लपेटकर या आधा चम्मच अदरक के रस के साथ लें।
कफकेतु रस की एक गोली को आधा चम्मच अदरक के रस से दिन में दो बार लें।
लसूड़े को बीज समेत बिना घी के थोड़ा-सा भूनकर उसमें आधा चम्मच सौंठ, दो लौंग और चौथाई चम्मच दालचीनी मिलाकर पानी में उबालकर चीनी डालकर शर्बत बना लें। इसे दिन में दो-तीन बार लें।
एक बताशे में एक काली मिर्च डालकर चबा लें। इस तरह दिन में एक बार तीन-चार बताशे खाएं।

घरघराहट या खड़खड़ वाली खांसी
इस खांसी में पसलियां चलती हैं, जिससे छाती में से आवाज-सी निकलती है।
तालिसादि चूर्ण तीन ग्राम पानी से दिन में तीन बार लें।
वासावलेह आधा चम्मच गर्म पानी से दिन में दो बार लें।
एक्सपर्ट से पूछकर श्रृंग भस्म और सितोपलादि चूर्ण का मिक्सचर लें।
लक्ष्मी विलास की एक-एक गोली सुबह-शाम पानी से लें।
चिरौंजी को पीसकर थोड़े से घी में छौंक लें और दूध मिलाकर उबालें। इसमें थोड़ा इलायची पाउडर और शहद मिलाकर पी लें। शुगर के मरीज बिना शहद के लें।
रात को सरसों का तेल गर्म करके छाती पर मलने के बाद रुई या गर्म कपड़ा छाती पर बांध दें।
छाती पर गर्म पानी की बोतल भी रख सकते हैं।
ऐलोविरा का गूदा निकालकर उसे भूनकर पांच काली मिर्च मिलाकर गोली बना लें। बच्चों को दो-दो गोली सुबह-शाम दूध से दें। रात में इमरजेंसी होने पर भाप लें और जुशांदे को गर्म पानी में उबालकर लें।

नोट : सभी दवाएं किसी वैद्य की देखरेख में लें।

चंद सवाल-जवाब

खांसी व अस्थमा में क्या फर्क है ?
अस्थमा होने पर छाती से सीटी और शां शां की आवाज आती मालूम पड़ती है और सांस फूल जाता है, जबकि साधारण खांसी गले में खराबी की वजह से भी हो जाती है।

खांसी न्यूमोनिया से हुई है या वायरल से हुई है, कैसे पहचानें?
वायरस से होने वाली खांसी आम होती है, पर न्यूमोनिया से होने वाली खांसी में एक्सरे कराने पर न्यूमोनिया का पैच दिखाई देता है। ब्लड टेस्ट कराने पर भी न्यूमोनिया के लक्षण सामने आ जाते हैं।

पफ व नेबुलाइजर की जरूरत कब पड़ती है?
अगर सांस लेने पर सीटी की आवाज आए और आप घर पर हों तो नेबुलाइजर की मदद लें। अगर घर से बाहर हों तो जेब में रखने वाला पफ या इनहेलर लें। जरूरत के अनुसार यह दिन में दो बार लिया जा सकता है या डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसका यूज करें।

बलगम में खून आए तो?
खांसी से खून आए तो घबराना नहीं चाहिए। कई बार जोर से खांसने पर भी खून आ जाता है। खून आने पर देखना चाहिए कि उसका रंग लाल है या काला। ऐसे में खून की जांच और छाती का एक्सरे व सीटी स्कैन करवाना चाहिए। बार-बार खून आए तो टेस्ट जरूर करा लेने चाहिए। टीबी और लंग कैंसर की वजह से भी खून आ सकता है। टीबी की जांच के लिए ईएसआर, बैक्टीरिया के लिए टीएलसी और वायरस के लिए डीएलसी जांच की जाती है।

डॉक्टर के पास कब जाएं?
अपने आप डॉक्टर न बनें और न ही घरेलू इलाज के भरोसे रहें। डॉक्टर को दिखाना ही बेहतर है।

कितने दिनों बाद समझें कि खांसी खतरनाक है?
खांसी को एक हफ्ते से ज्यादा हो जाए तो ब्लड की जांच कराएं।